अमृता प्रीतम के हिंदी उपन्यासों में द्विरूक्ति शब्दों का प्रयोग - एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
दुर्गावती शर्मा,
शोध छात्रा, साहित्य एवं भाषा अध्ययन शाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छग)
अमृता प्रीतम मूल रूप से हिंदी की रचनाकार नही थी तथापि उन्होंने मुल रूप से हिंदी रचना में प्रयुक्त होने वाले द्विरूक्तियों का बेहतर प्रयोग किया है। द्विरूक्तियां, रचना की निरंतरता एवं लय को बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और उपन्यासकार की लेखन क्षमता को प्रदर्शित करती हंै।
सामान्यतया शब्द या रूप-विशेष की दो या अधिक बार आवृŸिा द्विरुक्ति कहलाती है। यथा- काला-काला, घर-घर, जहाँ-जहाँ, बच्चा-बच्चा, हँसते-हँसते आदि। इसके लिए पुनरूक्त् िशब्द भी प्रचलन में है। पुनरूक्ति से क्रमशः ‘‘बार-बार कथन’ और ‘‘बार-बार पूर्ण रूप से दोहराना’’ का बोध होता है। द्विरूक्ति के मूल में संदर्भानुसार प्रत्येकता, के साथ-साथ द्वित्व, बहुत्व आदि का भाव निहित होता है। इस दृष्टि से एक ही व्यक्ति/ स्थान/ वस्तु/ गुण/ घटना के अर्थगत वैशिष्ट्य की अभिव्यक्ति के लिए द्विरूक्ति का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। (जगन्नाथन, 1981, 204)
भाषा में द्विरुक्ति वाक्यगत और प्रोक्तिगत भी होती है, जो बलात्मकता के रूप में अपनाई जाती है। द्विरुक्ति कोशीय शब्दों, पदों, वाक्यांशों, प्रोक्तियों की ही होती है, व्याकरणिक शब्दों की नहीं। द्विरुक्ति शब्दों का अर्थ संदर्भानुसार प्रत्येकता, अधिकता, समग्रता, बारंबारता, निरंतरता, सादृश्य, निश्चयात्मकता, साहचर्य, भिन्नता, इत्यादिकता, ध्वन्यात्मकता, प्रत्याशा, तात्कालिकता, यथोचितता आदि में हैं।
अमृता प्रीतम ने अपने उपन्यास ‘पिंजर’ और ‘धरती सागर और सीपियाँ’ में मन की भावनाओं को प्रभावशाली बनाने के लिए द्विरुक्तियों का प्रयोग अधिक किया है। इनमें सबसे अधिक द्विरुक्ति शब्दों को स्थान ‘पिंजर’ में मिला है, यथा- ‘‘एक-एक करके कई दिन बीत गए, दिन-दिन करके महीने और महीना-महीना करके कई बरस बीतगए। ’’रचना की दृष्टि से द्विरूक्तियों का वर्गीकरण निम्नानुसार किया गया है-
पूर्ण द्विरुक्ति
इसमें शब्दों का पुनः प्रयोग या एक शब्द का दो बार आना होता है। शब्दों के बीच में का, के, की और न का प्रयोग मिलता है, जैसे- चुप-की-चुप, ढेर-के-ढेर आदि।
(क) पिंजर में पूर्ण द्विरुक्ति
कभी-कभी
‘‘कभी-कभी गाँव के छोटे-छोटे लड़के उसके पीछे लग जाते, तालियाँ बजाते, पगली को दौड़ाते, आप पीछे-पीछे दौड़ते।’’ (51)
ठीक-ठीक
’’अनाज चारा और अन्य वस्तुओं का ठीक-ठीक व्यवस्था करके वह सियाम चले गए।’’(8)
त्राहि-त्राहि
‘‘वह कैसा पुरुष था। अवश्य ही कोई पशु होगा जिसने इस जैसी पागल की यह दुर्दशा बना दी। अब स्त्रियाँ त्राहि-त्राहि करती थीं।’’ (52)
दिन-दिन
‘‘जाड़ा दिन-दिन बढ़ रहा था।’’ (38)
पल-पल
‘‘पूरो की चीखें उड़ती हुई हुई घोड़ी के साथ पल-पल दूर होती चली गई।’’ (15)
बड़ी-बड़ी
‘‘उस लड़की के मलिन मुख पर बड़ी-बड़ी थकी हुई सी आँखें थी।’ (40)
भर-भर
‘‘पूरो का दिल भी आज भर-भर आता था।’’ (15)
युग-युग
‘‘उसका मंगेतर युग-युग जिए।’’ (15)
रोज़-रोज़
‘‘उसे रोज़-रोज़ देखने की सबको आदत-सी हो गई थी।’’ (51)
हल्की-हल्की
शरद ऋतु की हल्की-हल्की ठंड थी।’’ (35)
(ख) धरती सागर और सीपियाँ
पूर्ण द्विरुक्ति
अपने-अपने
जब सब अपने-अपने घर चले गए तो चेतना इकबाल के साथ उसके घर उसका नया जत़रबा देखने के लिए चली आई।’’ (11)
काली-काली
‘‘काली-काली चींटियों की एक पंक्ति बंध जाती है और अपने छोटे-छोटे पैरों से बढ़ती हुई यह पंक्ति मेरे मन की दीवार पर चढ़कर इस कदर छा जाती है कि सारी दीवार काली दिखाई देने लगती है।’’ (105)
छोटी-छोटी
‘‘बड़ी छोटी-छोटी बाते हैं, पर एक तरह से बड़ी भी हैं।’’ (105)
पढ़ते-पढ़ते
‘‘पढ़ते-पढ़ते चेतना चैंक उठी।’’ (81)
मोटी-मोटी
‘‘उसकी दोनों आँखें काजल की मोटी-मोटी लकीरों की तरह दिखाई देने लगी।’’ (10-11)
सोचते-सोचते
‘‘जिसके बारे में सोचते-सोचते अपने चैन की कई-कई रातें गुजार दिया करता था।’’ (31)
अपूर्ण द्विरुक्ति
एक ही शब्द दो बार प्रयुक्त होता है, परंतु उसमें दूसरी बार प्रयुक्त शब्द थोड़े परिवर्तन के साथ प्रयुक्त होते हैं, उन्हें अपूर्ण द्विरुक्ति कहते हैं। अपूर्ण द्विरुक्ति का प्रयोग हिंदी में भी कम ही मिलता है। ऐसे शब्द अर्थ का विस्तार करते है अतः उपन्यासों में इसका बहुत कम प्रयोग हुआ है।
(क) पिंजर अपूर्ण द्विरुक्ति
अता-पता
‘‘पुलिस भी बहुत खोज-खबर लगाकर हार गई पर उन्हें कोई अता-पता नहीं लग सका।’’ (21)
लंबे-तड़ंगे
‘‘लंबे-तड़ंगे जाट कमर में कोरे तहमद बाँधे हुए हाथों में तेल से चमकाई हुई लाठियाँ लिए मन में उत्साह और उल्लास भरे इधर से उधर आ-जा रहे थे।’’
(ख) धरती सागर और सीपियाँ अपूर्ण द्विरुक्ति
आस-पड़ोस
‘‘वह आस-पड़ोस में दूध बेचता है.......’’ (64)
झाड़ना-बहारना
‘‘पर मकान को झाड़ने-बुहारने से समय नहीं मिला था।’’ (81)
पर्याय द्विरुक्ति
’लगभग एक अर्थ वाले शब्दों का युग्म पर्याय द्विरुक्ति की श्रेणी में आते है। हिंदी में पर्याय-द्विरुक्तियों की संख्या कम है।’
(क) पिंजर पर्याय द्विरुक्ति
अच्छे-भले
‘‘ऐसे तो अच्छे-भले आदमी का जी घबरा उठे।’’ (27)
काम-काज
‘‘पूरो बच्चे के काम-काज में लगी हुई थी।’’ (54)
गोरा-चिट्टा
’’रुई के गाले जैसे गोरे-चिट्टे बालक को पूरो ने नहलाकर एक खटोले में लिटा रखा था।’’ (54)
साग-भाजी
‘‘बुढ़िया ने आते ही यह पहली बात पूछी और हाथ की साग-भाजी की टोकरी धरती पर रखकर लाजो वाली खाट की पट्टी पर बैठ गई।’’ (97)
(ख) धरती सागर और सीपियाँ पर्याय द्विरुक्ति
तोड़-फोड़
‘‘वह तोड़-फोड़ पहले आसपास की चीज़ों पर होती है।’’ (77)
भूल-चूक
‘‘खत भी भूल-चुक ही लिखता है।’’ (79)
संग-साथ
‘‘जैसे देह की सारी आवश्यकताएँ और माँगे संग-साथ होकर उसकी आँखों में आ बैठी हों।’’ (82)
विपर्याय द्विरुक्ति
प्रथम शब्द के उल्टे अर्थ वाले द्वितीय शब्द रूपों को विपर्याय द्विरुक्ति कहते हैं। हिंदी में विपर्याय-द्विरुक्तियों की संख्या अधिक है। अमृता प्रीतम ने अपने मनोभावों को अभिव्यक्ति देने के लिए विपर्याय-द्विरुक्ति शब्दों का भरपूर प्रयोग किया है। इसका अत्यधिक प्रयोग पिंजर में ही दिखाई देता है।
(क) पिंजर विपर्याय द्विरुक्ति
आती-जाती
‘‘न तू आती-जाती है, न किसी से मिलती-जुलती है।’’ (27)
कच्ची-पक्की
’’दाल गुलभŸाी-सी हो गई, रोटियाँ कच्ची-पक्की सी रह गई।’’ (45)
दिन-रात
‘‘रहीम की माँ को यही चिन्ता दिन-रात सताती थी।’’ (66)
बुरी-भली
‘‘रशीद ने उसे कोई बुरी-भली बात नहीं कही थी।’’ ( 85 )
शकुन-अपशकुन
‘‘पूरो इन्हीं शकुन-अपशकुन में फंसी हुई थी।’’ (11)
(ख) धरती सागर और सीपियाँ विपर्याय द्विरुक्ति
ऊपर-नीचे
‘‘यह नाड़ी ऊपर-नीचे हो जाती है।’’ (33)
चढ़ाव-उतार
‘‘नज़र सीध में नहीं थी, चढ़ाव-उतार में थी, जैसे लकीरों के जंगल में खो गई हो।’’ (85)
थोड़ा-बहुत
‘‘नई आई लड़कियों में से कुछेक ने तो थोड़ा-बहुत छीन-झपटकर मुँह जुठा लिया, पर मैं मुँह ताकती बैठी रही।’’ (75)
दुःख-सुख
‘‘सारा दिन लोग उसे घेरे रहते हैं। वह उनका दुःख-सुख सुनता है। पर मैं औरत हूँ।’’ (61)
यहाॅ सहप्रयोग सुख-दुख के विपर्यय रूप में ’दुख सुख’ दुख की अधिकता को व्यक्त कर रहा है।
अनुकरणात्मक द्विरुक्ति
प्रथम शब्द का ही जहाँ अनुकरण होता है और इत्यादि का अर्थ छिपा हो अनुकरणात्मक द्विरुक्ति है। इनमें दूसरा शब्द ध्वनि-परिवर्तन के रूप में उपस्थित रहता है।
(क) पिंजर अनुकरणात्मक द्विरुक्ति
अफ़ीम-शफीम
‘‘बुढ़िया कुछ अफ़ीम-शफीम नहीं खाती ?’’ (95)
ढोर-डंगर
‘‘धर्मशाला में तो ढोर-डंगर का ही इतना काम है, मुफ्त में काम करने वाला मिला जाएगा।’’ (59)
नौकर-चाकर
‘‘साई के नौकर-चाकर वहीं ला देते थे।’’ (71)
शक-शुबहे
‘‘कहीं आग किसी और ने लगाई हो और शक-शुबहे में वह पकड़ा जाए..’’ (79)
हाल-चाल
‘‘वह किस के पास चार दिन रहता, किस से वह गाँव के हाल-चाल लेता....’’ (89)
(ख) धरती सागर और सीपियाँ अनुकरणात्मक द्विरुक्ति
कभी-कभार
‘‘फिर भी चेतना ने अपनी माँ को कभी-कभार दिन में होठों में गुनगुनाते ध्यान में मग्न होते हुए कभी किसी निराकार के आगे माथा नवाते हुए देखा था।’’ (32)
भीड़-भड़क्का
‘‘चेतना और मिन्नी की यह मुलाकात भीड़-भड़क्के में र्हुअ थी।’’ (57)
साहचर्यमूलक द्विरुक्ति
ऐसे शब्द जो साथ-साथ प्रयोग में आते हैं - साहचर्यमूलक द्विरुक्ति कहलाते हैं। ‘पिंजर’ उपन्यास में अमृता प्रीतम ने भाषा में माधुर्य एवं संपूर्णता के अर्थ में साहचर्यमूलक द्विरुक्ति का प्रयोग ‘धरती सागर और सीपियाँ’ उपन्यास से अधिक किया है।
(क) पिंजर साहचर्यमूलक द्विरुक्ति
अन्न-पानी
‘‘पर मैंने सिर्फ तेरे घर का अन्न-पानी मुँह लगाया है।’’ (20)
आटा-दाल
‘‘आटा-दाल वे अपने साथ ले आई थीं।’’ (71)
कुŸाा-बिल्ली
‘‘मैंने तो अल्लाह के रहम पर उसे उठा लिया था। जो घड़ी दो घड़ी और वहाँ न पहुँचता तो क्या पता कोई कुŸाा-बिल्ली ही उसे मुँह में धर लेता !’’ (60)
खाता-पीता
‘‘शाहों के उस परिवार ने गाँव आकर पहला काम किया कि पास के गाँव रŸाोवाल के एक अच्छे खाते-पीते घर में पूरो के लिए लड़का देखा।’’ (8)
गूंगा-बहरा
‘‘कौन कह सकता है कि लड़का भी पगली की तरह गूंगा-बहरा निकलता है।’’ (58)
चलते-फिरते
‘‘रोटी-टुकड़ा तो वह आंगन में इधर से उधर चलते-फिरते ही कर लेती है।’’ (14)
छोटी-मोटी
‘‘उन्होंने पूरो से बहुत पूछ-ताछ न की। छोटी-मोटी घर की आवश्यकताओं के संबंध में ही पूछती रहीं।’’ (25)
दवा-दारू
‘‘गाँव के हकीम की दवा-दारू हुई; ज्वर आते तीन दिन हो गए थे, जब हकीम ने कहा कि रशीद को शायद मियादी बुखार हो गया।’’ (46)
दादा-पोते
‘‘जहाँ दादा-पोते के रिश्ते के एक भाई रहीम की ज़मीन थी।’’ (24)
बाप-दादो
‘‘पूरो के पिता ने अपना गिरवी पड़ा हुआ मकान छुड़वाकर अपने बाप-दादों के नाम की लाज रख ली।’’ (8)
माता-पिता
‘‘आते समय पूरो जिन्दगी से भेंट करने आ रही थी उसके हृदय में लालसा थी जीने की माता-पिता से मिलने की।’’ (23)
लेना-देना
‘‘पूरो तेरा-मेरा संबंध कोई पिछला लेना-देना ही है।’’ (19)
सलाम-दुआ
‘‘उनका विचार था कि रशीद दो-चार साथियों को लेकर आएगा या शायद न भी आवे, तब वे उससे दूसरे ही ढंग से निबटेंगे, पर रशीद बिलकुल अकेला ही चला आया। सलाम-दुआ करके उनके सामने बैठ गया....’’ (60)
स्त्री-पुरुष
’’एक दिन अचानक ही रशीद एक आदमी को घर ले आया। वह बाँहों पर स्त्रियों-पुरुषों के नाम गोदता था।’’ (25)
(ख) धरती सागर और सीपियाँ में साहचर्य मूलक द्विरूक्ति
पूजा-पाठ
‘‘चेतना ने कभी पूजा-पाठ नहीं किया।’’ (32)
बाप-दादों
‘‘बाप-दादों का घर था, इसलिए उसे कोई छोड़ना भी नहीं चाहता था।’’ (71)
भाई-भतीजा
‘‘दो-चार दिन के लिए पटियाला हो आऊँ और भाई-भतीजों को मिल आऊँ।’’ (99)
माँ-बाप
‘‘लोग कहते हैं कि ऐसे निशान बच्चों को माँ-बाप से बिरसे में मिलते हैं.....’’ (38)
अर्थ के आधार पर द्विरुक्तियों का वर्गीकरण निम्नानुसार है-
(अ)प्रत्येकता/समग्रता
‘‘पूरो की चीखें उड़ती हुई घोड़ी के साथ पल-पल दूर होती चली गई।’’(2003, 15)
‘‘अभी शेखों के यहाँ से लोग आ जाएँगे और हमारे बच्चे-बच्चे को पेर डालेंगे।’’ (2003, 23)
(ब) अधिकता
‘‘पूरो ने फिर कम्मो का पैर मला.... हथेलियों से गरम-गरम घी लगाया...... रुई से सेंक किया।’’ (2003, 37)
‘‘एक दिन पालक के नरम-नरम पŸाों को तोड़कर पूरो ने साग काटा।’’ (2003, 14)
(स)सापेक्षता
‘‘पूरो का किसी से बहुत आना-जाना नहीं था।’’ (2003, 13)
‘‘सब लड़कियाँ आगे-पीछे इसी पगडंडी पर चली आ रही थीं।’’ (2003, 11)
‘‘हड्डियों के एक छोटे से पिंजर को दिन-रात कलेजे से लगाकर उसने छः महीने का कर दिया था।’’ (2003, 59)
(द)निरंतरता
‘‘जहाँ कहीं भी हरियाया पŸाा देखती उसे छू-छूकर बावरी हो जाती थी.’’ (1996, 7)
‘‘दौड़ते-दौड़ते वह इस गाँव में आ पहुँची।’’ (2003, 83)
(इ) इत्यादि
‘‘पहरे वाले सिपाहियों की देख-रेख में अपना मकई-बाजरी सोने के भाव बेच देते थे।’’ (2003, 84)
(फ) तात्कालिकता
‘‘किसी को कानों-कान खबर भी न होगी।’’ (2003, 111)
(क) अनुक्रमिकता
‘‘वह चुप की चुप गुम-सुम खेतों से बाहर चली गई....’’ (2003, 73)
‘‘वह कह रहा था कि हमारी कटी फसल के ढेर लगे हुए थे, मनों अनाज ढेरों का ढेर पड़ा हुआ था.....’’ (76)
‘‘चेतना ने देखा कि इस कैनवस में पेड़ ही पेड़ बने हुए थे।’’ (1996, 85)
इस प्रकार लेखिका ने द्विरुक्ति शब्दों का निर्माण संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया और क्रिया विशेषण से श्रोता/पाठक तक भावों को संप्रेषित करने के लिए किया है। शब्दों की द्विरुक्ति से भाषा में लयात्मकता आती है। भाषा में बिम्ब के माध्यम से अर्थ अधिक संप्रेषणीय बन गया है।
संदर्भ ग्रंथ सूची
1. जगन्नाथन, वी.रा.दिल्ली. प्रयोग और प्रयोग, आॅक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी प्रेस,1981.
2. तिवारी, भोलानाथ, दिल्ली. शैलीविज्ञान, शब्दकार, 159, गुरू अंगद नगर (वैस्ट) 1997
Received on 17.02.2015
Modified on 22.03.2015
Accepted on 28.03.2015
© A&V Publication all right reserved
Research J. Humanities and Social Sciences. 6(1): January-March, 2015, 18-22
DOI: 10.5958/2321-5828.2015.00004.2